Tuesday, May 22, 2012

चाँद की उलझन !

आज फिर
शाम ने
रात के साथ मिलकर
कसम खाई है..
सुबह .. होने ना देगी
मुझे जाने ना देगी.


कहती है..
रोज-रोज
मैं थोडा -सा बदल जाता हूँ..
सिर्फ मेरी शक्ल ही नहीं
मेरे जीने का अंदाज़ भी
जब भी ..
अगली शाम को
सिर उठाता हूँ
झील के पार से
बिखेरने.. चांदनी की किरणें 
तुम्हारे अप्रतिम सौंदर्य पर..

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१२

12 comments:

  1. अब बेचारा चाँद क्या करे???
    आरोप मिथ्या तो नहीं हैं ना!!!!

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    1. आरोप मिथ्या तो नहीं... पर इसमें चाँद की मजबूरी भी तो है, हम सब का बदल जाना माहौल. परिवेश और परिस्थितियों पर निर्भर करता है और फिर बदल कर भी अपनी अनोखी पहचान बचाए रखने की कोशिश तो तारीफ़ की बात है.

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  2. वाह बेहद सुन्दर..! कलात्मक ..

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  3. chaand ke saath kai dard puraane nikle....jo bhee gham thay mere gham ke bahaane nikle...!!

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    1. सुरेन्द्र जी : सच कहा आपने. चाँद से हमदर्दी तो रहेगी ही, क्योंकि साथ दिया है .. उसने जाने कितनी उदास रातों में.. कई बरसों से.

      धन्यवाद.

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  4. वाह ....प्रेम से परिपूर्ण

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  5. वाह ...बहुत ही बढि़या ..

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